PESA 1996 बनाम झारखंड PESA नियम 2025–26 : क्या ग्राम सभा वास्तव में सर्वोच्च है? (भाग–3)


पिछले भागों में हमने देखा कि PESA (1996) का उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों में वास्तविक स्वशासन स्थापित करना था।

अब सवाल है — झारखंड में जो PESA नियम 2025–26 लागू किए गए, क्या वे मूल भावना को मजबूत करते हैं या उसे सीमित करते हैं?

1️⃣ PESA 1996 की मूल भावना क्या थी?

संविधान के 73वें संशोधन के बाद, 1996 में PESA Act लाया गया।

इसका स्पष्ट उद्देश्य था:

ग्राम सभा को सर्वोच्च निर्णयकारी संस्था बनाना

भूमि अधिग्रहण से पहले ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति

लघु वन उपज पर आदिवासी समुदाय का अधिकार

परंपरागत रीति-रिवाजों और स्वशासन को मान्यता

अर्थात — शासन नीचे से ऊपर चले, ऊपर से नीचे नहीं।

2️⃣ झारखंड PESA नियम 2025–26 में क्या स्थिति दिखती है?

यहाँ मुख्य सवाल उठते हैं:

क्या ग्राम सभा की “सहमति” वास्तव में बाध्यकारी है या केवल औपचारिक प्रक्रिया?

क्या जिला प्रशासन अंतिम निर्णय ले सकता है?

क्या खनन और विकास परियोजनाओं में ग्राम सभा को वास्तविक veto power है?

अगर ग्राम सभा की बात अंतिम नहीं है,

तो PESA की मूल भावना कमजोर पड़ जाती है।

3️⃣ मुख्य कमियाँ (समाज के दृष्टिकोण से)

✔ ग्राम सभा की शक्ति स्पष्ट रूप से “अंतिम और बाध्यकारी” घोषित नहीं

✔ प्रशासनिक हस्तक्षेप की गुंजाइश

✔ CFR (Community Forest Rights) दावों की समयबद्ध गारंटी का अभाव

✔ विस्थापन पर स्पष्ट रोक का अभाव

4️⃣ क्या होना चाहिए था?

ग्राम सभा का निर्णय अंतिम और अनिवार्य घोषित हो

भूमि अधिग्रहण बिना ग्राम सभा की लिखित स्वीकृति असंवैधानिक माना जाए

CFR दावों के लिए समय सीमा तय हो

पारंपरिक न्याय प्रणाली को कानूनी मान्यता मिले

निष्कर्ष

PESA केवल कागज़ का कानून नहीं है —

यह आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व का प्रश्न है।

अगर ग्राम सभा मजबूत नहीं,

तो स्वशासन केवल शब्द बनकर रह जाएगा।

संविधान का सम्मान तभी होगा

जब पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र में सत्ता सच में गाँव के हाथ में होगी।

❓आज का सवाल:

क्या झारखंड PESA नियम 2025–26 में ग्राम सभा को वास्तव में सर्वोच्च बनाया गया है —

या वह केवल प्रक्रिया का हिस्सा भर है?

क्रमशः… (भाग–4 में: CNT–SPT और PESA का संबंध)

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