UGC का नया प्रावधान: आदिवासी–बहुजन दृष्टि से सच



भारत में जब भी कोई नया क़ानून बनता है,
तो एक सवाल ज़रूर पूछा जाना चाहिए—
क्या वह क़ानून बिना वजह बना है?
सच्चाई यह है कि
कोई भी क़ानून शौक़ में नहीं बनता।
क़ानून समस्या, अन्याय और शोषण के बाद बनते हैं—
ताकि उनका समाधान हो सके।
अगर उच्च शिक्षण संस्थानों में
ST–SC–OBC छात्रों के साथ
जातिगत भेदभाव,
मानसिक उत्पीड़न,
दुर्व्यवहार,
अपमान
और संस्थागत चुप्पी होती ही नहीं,
तो UGC को यह नया प्रावधान लाने की
कोई ज़रूरत ही नहीं थी।
यह क़ानून इसीलिए बना है क्योंकि—
छात्रों की आत्महत्याएँ हुईं
शिकायतें दबाई गईं
उत्पीड़न को “व्यक्तिगत कारण” कहा गया
और संस्थान अपनी ज़िम्मेदारी से बचते रहे
क़ानून हमेशा
अत्याचार और शोषण के ख़िलाफ़ बनता है,
किसी समाज के ख़िलाफ़ नहीं।
तो फिर सवाल उठता है—
अगर यह क़ानून भेदभाव रोकने के लिए है,
तो कुछ लोगों को इससे इतनी परेशानी क्यों हो रही है?
आदिवासी–बहुजन समाज यह साफ़ कहना चाहता है—
हम ST–SC–OBC होने के नाते
अत्याचार सहते रहने के लिए पैदा नहीं हुए हैं।
यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है कि
हमें अपमान झेलने की सलाह दी जाए,
और जब सुरक्षा का क़ानून बने,
तो उसे “विरोधी” कहा जाए।
यह भी समझना ज़रूरी है कि
क़ानून बनाते समय
केवल भावना नहीं,
संविधान, मौलिक अधिकार
और न्यायिक जांच को ध्यान में रखा जाता है।
UGC का यह प्रावधान
पूरी प्रक्रिया के बाद
गजट में प्रकाशित किया गया है।
अगर भविष्य में इसके इम्प्लीमेंटेशन में
कहीं मौलिक अधिकारों का हनन होता है,
तो संविधान खुद
संशोधन की अनुमति देता है।
लेकिन बिना लागू हुए ही
इसे “सवर्ण विरोधी” कहना
दरअसल जवाबदेही से बचने की कोशिश है।
आदिवासी–बहुजन दृष्टि से यह क़ानून—
डराने वाला नहीं
बल्कि सम्मान और सुरक्षा देने वाला है
यह चुप्पी की संस्कृति को तोड़ता है
और संस्थानों से जवाब माँगता है
यह क़ानून किसी के ख़िलाफ़ नहीं,
यह अमानवीय व्यवस्था के ख़िलाफ़ है।
अब सवाल यह नहीं है कि
UGC ने क़ानून क्यों बनाया,
सवाल यह है कि—
क्या हम आदिवासी–बहुजन
अपने अधिकारों के साथ खड़े होंगे,
या फिर चुप्पी को ही अपनी नियति मान लेंगे?

क्या उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव को रोकने के लिए
ऐसे क़ानून ज़रूरी नहीं हैं? आपकी राय क्या है?

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