संविधान की पाँचवीं अनुसूची और PESA कानून: काग़ज़ से ज़मीन तक की अधूरी यात्रा (भाग–1) प्रस्तावना

 

भारत का संविधान केवल एक क़ानूनी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि वंचित, आदिवासी और शोषित समाज के आत्मसम्मान की घोषणा है।

इसी संविधान की पाँचवीं अनुसूची आदिवासी बहुल क्षेत्रों को उनकी संस्कृति, ज़मीन और स्वशासन की रक्षा का अधिकार देती है।

लेकिन सवाल यह है—

जब संविधान मौजूद है, कानून मौजूद है, फिर भी आदिवासी क्षेत्रों में निर्णय कौन ले रहा है?

यह लेख इसी सवाल की पड़ताल का पहला अध्याय है।

पाँचवीं अनुसूची क्या है?

पाँचवीं अनुसूची उन क्षेत्रों के लिए बनाई गई है जहाँ आदिवासी समाज ऐतिहासिक रूप से निवास करता आया है।

इसका मूल उद्देश्य है—

आदिवासी समाज की ज़मीन की सुरक्षा

ग्राम सभा को सर्वोच्च निर्णय इकाई बनाना

बाहरी शोषण से संरक्षण

स्थानीय परंपरा और रीति-रिवाजों की रक्षा

संविधान निर्माताओं ने यह स्पष्ट किया था कि आदिवासी क्षेत्रों में दिल्ली या रांची से नहीं, गाँव से शासन चलेगा।

73वाँ संविधान संशोधन और ग्राम सभा

1992 में संविधान का 73वाँ संशोधन हुआ, जिसने पंचायत राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा दिया।

लेकिन यह व्यवस्था सामान्य क्षेत्रों के लिए थी, आदिवासी क्षेत्रों के लिए नहीं।

यहीं से समस्या शुरू हुई।

आदिवासी क्षेत्रों में पंचायत प्रणाली लागू तो की गई,

लेकिन ग्राम सभा के वास्तविक अधिकारों को स्पष्ट नहीं किया गया।

PESA कानून 1996: एक ऐतिहासिक कदम

इस कमी को दूर करने के लिए संसद ने 1996 में PESA कानून (पंचायत विस्तार अनुसूचित क्षेत्र अधिनियम) बनाया।

PESA का मूल दर्शन था—

ग्राम सभा सिर्फ सलाहकार नहीं, निर्णयकर्ता होगी

जल, जंगल, ज़मीन पर पहला अधिकार ग्राम सभा का

खनन, विस्थापन, भूमि अधिग्रहण में ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य

स्थानीय परंपराओं को कानूनी मान्यता

यह कानून आदिवासी स्वशासन का संवैधानिक हथियार था।

झारखंड में PESA: देरी, टालमटोल और राजनीति

झारखंड राज्य 2000 में बना,

लेकिन PESA नियम बनाने में 25 साल की देरी कर दी गई।

1996 में कानून बना

2000 में झारखंड राज्य बना

लेकिन 2024–25 तक नियम नहीं बने

यह देरी केवल प्रशासनिक नहीं थी,

यह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी थी।

24 दिसंबर: एक ऐतिहासिक लेकिन अधूरा निर्णय

24 दिसंबर को झारखंड सरकार ने PESA नियमों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया।

इसके बाद लगभग एक महीने की प्रक्रिया में ड्राफ्ट तैयार हुआ और आगे गजट की प्रक्रिया चली।

यह निर्णय ऐतिहासिक इसलिए है क्योंकि—

पहली बार सरकार ने स्वीकार किया कि

“बिना PESA नियम के पाँचवीं अनुसूची अधूरी है”

लेकिन सवाल यह है—

❓ क्या नियम ग्राम सभा को असली शक्ति देते हैं?

❓ या फिर वही नौकरशाही नियंत्रण बना रहता है?

संविधान बनाम ज़मीनी सच्चाई

आज स्थिति यह है—

कानून संविधान में है

नियम काग़ज़ पर हैं

लेकिन ज़मीन पर फैसला अभी भी

अधिकारी

कंपनियाँ

और सत्ता के गलियारों में होता है

ग्राम सभा को अक्सर—

सिर्फ हाजिरी रजिस्टर बना दिया गया

फैसले पहले हो जाते हैं, मंज़ूरी बाद में ली जाती है

यह श्रृंखला क्यों ज़रूरी है?

यह केवल एक ब्लॉग नहीं,

यह आदिवासी समाज की संवैधानिक चेतना का दस्तावेज़ है।

आने वाले भागों में हम चर्चा करेंगे—

PESA 1996 की कमियाँ

2024–26 के नियमों की खामियाँ

क्या नहीं होना चाहिए

क्या ज़रूर होना चाहिए

और ग्राम सभा को असली ताकत कैसे मिले

समापन (भाग–1)

पाँचवीं अनुसूची कोई एहसान नहीं,

यह संवैधानिक अधिकार है।

जब तक ग्राम सभा निर्णय नहीं लेगी,

तब तक आदिवासी स्वशासन एक सपना ही रहेगा।

क्रमशः… (भाग–2 में जारी रहेगा)

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