CNT–SPT, PESA और भूमि अधिकार: कानून मजबूत, ज़मीन कमजोर क्यों? (भाग–4)
आदिवासी समाज के भूमि अधिकार की रक्षा के लिए केवल एक कानून नहीं, बल्कि कई संवैधानिक और वैधानिक प्रावधान मौजूद हैं।
झारखंड में विशेष रूप से:
छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 (CNT Act)
संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 (SPT Act)
PESA अधिनियम, 1996
इन सभी का उद्देश्य एक ही है —
👉 आदिवासी भूमि की सुरक्षा
👉 बाहरी हस्तांतरण पर रोक
👉 ग्राम आधारित नियंत्रण
फिर भी सवाल वही है —
जब कानून इतने मजबूत हैं, तो भूमि अधिग्रहण और विस्थापन क्यों जारी है?
1️⃣ CNT–SPT कानून क्या कहते हैं?
✔ CNT Act (1908)
आदिवासी भूमि गैर-आदिवासी को बेचना प्रतिबंधित
भूमि हस्तांतरण पर सख्त नियंत्रण
✔ SPT Act (1949)
संथाल परगना क्षेत्र में भूमि संरक्षण
सामुदायिक संरचना की रक्षा
इन कानूनों का मूल दर्शन था —
भूमि केवल संपत्ति नहीं, पहचान है।
2️⃣ PESA 1996 क्या जोड़ता है?
PESA कहता है:
भूमि अधिग्रहण से पहले ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति
पुनर्वास और मुआवज़ा पर ग्राम सभा की भूमिका
प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण
यानी CNT–SPT भूमि की रक्षा करते हैं,
और PESA निर्णय की शक्ति ग्राम सभा को देता है।
3️⃣ फिर समस्या कहाँ है?
❌ “सार्वजनिक उद्देश्य” का रास्ता
भूमि अधिग्रहण कानूनों के माध्यम से
“विकास” के नाम पर भूमि ली जाती है।
❌ सहमति बनाम सूचना
कई बार ग्राम सभा से केवल औपचारिक सूचना ली जाती है,
सहमति को बाध्यकारी नहीं माना जाता।
❌ प्रशासनिक दबाव
ग्राम सभा की बैठकें प्रभाव में करवाई जाती हैं।
4️⃣ समाज की दृष्टि से मुख्य कमियाँ
✔ भूमि सुरक्षा कानून होने के बावजूद
→ अधिग्रहण जारी
✔ ग्राम सभा की सहमति स्पष्ट रूप से अंतिम नहीं
✔ पुनर्वास प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी
✔ पारंपरिक सामुदायिक भूमि की स्पष्ट परिभाषा का अभाव
5️⃣ क्या होना चाहिए?
ग्राम सभा की लिखित सहमति के बिना अधिग्रहण पूर्णतः अमान्य हो
CNT–SPT और PESA को समन्वित रूप से लागू किया जाए
सामुदायिक भूमि की डिजिटल और कानूनी पहचान सुनिश्चित हो
पुनर्वास को ग्राम सभा की निगरानी में रखा जाए
निष्कर्ष
झारखंड में भूमि अधिकार केवल कानूनी प्रश्न नहीं,
यह अस्तित्व का प्रश्न है।
कानून मजबूत हैं —
लेकिन उनका क्रियान्वयन कमजोर है।
जब तक ग्राम सभा निर्णय की अंतिम इकाई नहीं बनेगी,
तब तक भूमि सुरक्षा अधूरी रहेगी।
❓ आज का सवाल:
क्या CNT–SPT और PESA साथ मिलकर आदिवासी भूमि की रक्षा कर पा रहे हैं,
या वे अलग-अलग कानून बनकर रह गए हैं?
क्रमशः… (भाग–5 में: ग्राम सभा की वास्तविक शक्ति और उसकी सीमाएँ)
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