संविधान में आदिवासी स्वशासन: पाँचवीं अनुसूची क्या कहती है?
भारत का संविधान केवल क़ानूनों का संग्रह नहीं, बल्कि देश के विविध समाजों के अधिकारों की स्वीकारोक्ति है। आदिवासी समाज के लिए संविधान में विशेष प्रावधान किए गए हैं, ताकि उनकी भूमि, संस्कृति और स्वशासन सुरक्षित रह सके। इन्हीं प्रावधानों का मूल आधार है — पाँचवीं अनुसूची।
पाँचवीं अनुसूची क्या है?
संविधान के अनुच्छेद 244(1) के अनुसार, देश के अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन पाँचवीं अनुसूची के तहत चलाया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य आदिवासी समाज को बाहरी शोषण से बचाना, जल–जंगल–ज़मीन की रक्षा करना और स्वशासन को मज़बूत करना है।
किसे दी गई है जिम्मेदारी?
पाँचवीं अनुसूची राज्यपाल को विशेष अधिकार देती है। राज्यपाल ऐसे क़ानूनों को रोक या संशोधित कर सकते हैं जो आदिवासी हितों के विरुद्ध हों। साथ ही आदिवासी सलाहकार परिषद (TAC) के माध्यम से आदिवासी समाज की राय को शासन तक पहुँचाने की व्यवस्था की गई है।
काग़ज़ और ज़मीन का फर्क
यदि पाँचवीं अनुसूची इतनी सशक्त है, तो फिर ग्राम सभा के निर्णयों की अनदेखी क्यों होती है? भूमि अधिग्रहण बिना सहमति कैसे हो जाता है? वन अधिकार अधिनियम के बावजूद जंगलों पर स्थानीय समुदाय का अधिकार क्यों सीमित है? यह अंतर बताता है कि समस्या संविधान में नहीं, उसके क्रियान्वयन में है।
स्वशासन का वास्तविक अर्थ
आदिवासी स्वशासन केवल चुनाव तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ है ग्राम सभा की सर्वोच्चता, सामूहिक निर्णय, और संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण। लेकिन व्यवहार में निर्णय ऊपर से थोपे जाते हैं, जबकि संविधान नीचे से ऊपर की लोकतांत्रिक व्यवस्था की बात करता है।
निष्कर्ष
पाँचवीं अनुसूची कोई विशेष कृपा नहीं, बल्कि आदिवासी समाज का संवैधानिक अधिकार है। जब तक यह ज़मीन पर पूरी तरह लागू नहीं होती, तब तक आदिवासी स्वशासन अधूरा ही रहेगा।
सवाल
अगर संविधान आदिवासी स्वशासन को मान्यता देता है, तो पाँचवीं अनुसूची आज भी ज़मीन पर पूरी तरह लागू क्यों नहीं है?
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