आदिवासी क्षेत्रों में संवैधानिक स्वशासन क्यों लागू नहीं हो पाया? — विस्थापन बनाम संविधान


भारत का संविधान आदिवासी समाज को केवल नागरिक के रूप में नहीं,
स्वशासित समुदाय के रूप में मान्यता देता है।
पाँचवीं अनुसूची, PESA (1996) और वन अधिकार अधिनियम (FRA, 2006)
इस बात के प्रमाण हैं कि संविधान ने आदिवासी समाज के
जल–जंगल–ज़मीन और निर्णय के अधिकार को स्वीकार किया है।
लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि
ये संवैधानिक प्रावधान आज भी
अधिकतर काग़ज़ों और फाइलों तक सीमित हैं।
मुख्य आपत्तियाँ
1️⃣ ग्राम सभा को निर्णयकारी शक्ति नहीं
PESA क़ानून ग्राम सभा को
स्थानीय संसाधनों और विकास निर्णयों में
मुख्य भूमिका देता है।
लेकिन व्यवहार में ग्राम सभा को
केवल “सलाहकार” बनाकर रखा गया है,
जबकि असली निर्णय प्रशासन द्वारा लिए जाते हैं।
2️⃣ FRA का वन विभाग द्वारा उल्लंघन
FRA आदिवासियों को
व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार (CFR) देता है।
इसके बावजूद
वन विभाग आज भी
परंपरागत अधिकारों को मान्यता देने से बचता है,
और कई जगह दावे जानबूझकर लंबित रखे जाते हैं।
3️⃣ CNT–SPT के बावजूद भूमि अधिग्रहण
CNT और SPT जैसे क़ानून
आदिवासी भूमि की सुरक्षा के लिए बने हैं।
फिर भी विकास परियोजनाओं,
माइनिंग और उद्योग के नाम पर
भूमि अधिग्रहण लगातार जारी है।
यह कानून की भावना का सीधा उल्लंघन है।
4️⃣ विकास परियोजनाओं में जबरन सहमति
संविधान कहता है—
आदिवासी क्षेत्रों में
ग्राम सभा की स्वतंत्र सहमति अनिवार्य है।
लेकिन कई मामलों में
सहमति को औपचारिकता बनाकर
जबर्दस्ती ली जाती है।
प्रमुख मांगें
ग्राम सभा के निर्णय को अंतिम और बाध्यकारी घोषित किया जाए।
सभी लंबित CFR दावों को समयबद्ध तरीके से स्वीकृत किया जाए।
आदिवासी क्षेत्रों में जबरन विस्थापन पर पूर्ण रोक लगे।
आदिवासी स्वशासन को
केवल योजना नहीं,
बल्कि स्वतंत्र प्रशासनिक दर्जा दिया जाए।
निष्कर्ष
संविधान केवल कानूनों का संग्रह नहीं,
बल्कि न्याय और आत्मसम्मान की घोषणा है।
जब तक
आदिवासी स्वशासन जीवित नहीं होता,
जब तक
ग्राम सभा को वास्तविक अधिकार नहीं मिलते,
तब तक यह कहना कठिन है कि
संविधान पूरी तरह लागू हुआ है।
संविधान तब तक अधूरा है,
जब तक आदिवासी स्वशासन अधूरा है।

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