पाँचवीं अनुसूची बनाम प्रशासनिक व्यवस्था: टकराव कहाँ और क्यों? (भाग–6)


भारत के संविधान की पाँचवीं अनुसूची आदिवासी क्षेत्रों को विशेष संरक्षण और स्वशासन की व्यवस्था देती है।
लेकिन व्यवहार में अक्सर देखा जाता है कि प्रशासनिक ढांचा और संवैधानिक प्रावधान एक-दूसरे के विपरीत खड़े दिखाई देते हैं।
सवाल है —
क्या टकराव कानून में है, या व्यवस्था के संचालन में?
1️⃣ पाँचवीं अनुसूची क्या कहती है?
पाँचवीं अनुसूची के अनुसार:
अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष प्रावधान होंगे
राज्यपाल को विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं
जनजातीय सलाहकार परिषद (TAC) बनाई जाती है
आदिवासी हितों की रक्षा प्राथमिकता होगी
अर्थात — सामान्य प्रशासनिक ढांचा यहाँ पूर्ण रूप से लागू नहीं होना चाहिए।
2️⃣ वास्तविक प्रशासनिक ढांचा क्या है?
व्यवहार में:
जिला उपायुक्त (DC) अंतिम प्रशासनिक प्राधिकारी
विभागीय अधिकारी योजनाओं का निर्णय लेते हैं
फाइल आधारित शासन प्रणाली
यानी निर्णय प्रक्रिया अभी भी
ऊपर से नीचे की दिशा में चलती है।
3️⃣ टकराव कहाँ दिखता है?
❌ 1. ग्राम सभा बनाम जिला प्रशासन
ग्राम सभा प्रस्ताव पारित करती है,
लेकिन अंतिम निर्णय जिला स्तर पर।
❌ 2. राज्यपाल की विशेष शक्ति का सीमित उपयोग
संविधान में शक्ति है,
पर व्यवहार में बहुत कम प्रयोग।
❌ 3. TAC की सीमित भूमिका
सलाहकारी संस्था होने के कारण
निर्णय बाध्यकारी नहीं।
4️⃣ परिणाम क्या होता है?
योजनाएँ बिना व्यापक ग्राम सहमति के लागू
भूमि और संसाधन पर बाहरी हस्तक्षेप
संवैधानिक भावना कमजोर
इससे पाँचवीं अनुसूची का उद्देश्य प्रभावित होता है।
5️⃣ समाधान की दिशा
✔ ग्राम सभा के प्रस्तावों को बाध्यकारी दर्जा
✔ TAC को अधिक प्रभावी भूमिका
✔ राज्यपाल की शक्तियों का सक्रिय प्रयोग
✔ प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही
निष्कर्ष
टकराव संविधान और प्रशासन में नहीं,
बल्कि प्राथमिकता और दृष्टिकोण में है।
जब तक पाँचवीं अनुसूची को
“विशेष संरक्षण” की तरह नहीं,
बल्कि “विशेष जिम्मेदारी” की तरह नहीं देखा जाएगा,
तब तक स्वशासन अधूरा रहेगा।
❓ आज का सवाल:
क्या प्रशासन पाँचवीं अनुसूची के अनुरूप ढल रहा है,
या पाँचवीं अनुसूची को प्रशासन के अनुरूप ढाला जा रहा है?
क्रमशः… (भाग–7 में: ज़मीनी सच्चाई)

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