आदिवासी अस्तित्व और स्वशासन: जागरूकता ही हमारा सबसे बड़ा आंदोलन

 आदिवासी समाज का इतिहास केवल जंगल और जमीन तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह स्वशासन, आत्मसम्मान और प्रकृति के साथ संतुलन की एक जीवित परंपरा है। हमारे पूर्वजों ने बिना किसी लिखित संविधान के भी समाज को नियम, मर्यादा और सामूहिक सहमति के साथ चलाया।

आज के समय में सबसे बड़ा संकट यह है कि आदिवासी समाज को उसके ही अधिकारों से अनजान रखा जा रहा है। जल, जंगल और जमीन पर हमारा प्राकृतिक अधिकार होते हुए भी, बाहरी शक्तियाँ योजनाबद्ध तरीके से हमें हाशिए पर धकेल रही हैं।

आदिवासी स्वशासन कोई नई मांग नहीं है।

यह हमारी परंपरागत ग्राम सभा, मांझी-परगना, पड़हा व्यवस्था और सामूहिक निर्णय प्रणाली का आधुनिक नाम है। संविधान की पाँचवीं अनुसूची और PESA कानून भी इसी परंपरा को कानूनी मान्यता देते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इन्हें लागू नहीं किया जा रहा।

आज जरूरत है कि आदिवासी समाज जागे, पढ़े, समझे और सवाल करे। आंदोलन केवल सड़क पर उतरने से नहीं होता, आंदोलन विचार से शुरू होता है। जब हर घर में अधिकारों की समझ होगी, तब कोई भी ताकत हमें कमजोर नहीं कर पाएगी।

यह ब्लॉग उसी विचार का एक छोटा प्रयास है —

आदिवासी समाज को जागरूक करना, अपने अधिकारों से जोड़ना और आने वाली पीढ़ी को सच बताना।

आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि

हम अपनी पहचान, संस्कृति और स्वशासन की लड़ाई शांतिपूर्ण, वैचारिक और संगठित तरीके से आगे बढ़ाएँगे।

जागरूक आदिवासी ही सशक्त आदिवासी है।

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