मंडल बनाम कमंडल: आदिवासी–बहुजन हक़ों को भटकाने की राजनीति


“मंडल बनाम कमंडल” कोई सामान्य राजनीतिक बहस नहीं थी, बल्कि यह तय करने की लड़ाई थी कि
भारत सामाजिक न्याय से चलेगा या धार्मिक उन्माद से।
मंडल आयोग ने पहली बार यह स्वीकार किया कि इस देश की सत्ता, शिक्षा और नौकरियों में
आदिवासी–बहुजन (SC-ST-OBC) की भागीदारी नगण्य है।
आरक्षण कोई भीख नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय का संवैधानिक सुधार था।
लेकिन जैसे ही मंडल ने सवाल उठाया—
सत्ता पर किसका हक़ है?
वैसे ही कमंडल राजनीति सामने लाई गई।
कमंडल का उद्देश्य साफ़ था—
जाति के सवाल को धर्म के शोर में दबा दो,
आदिवासी–बहुजन एकता को तोड़ दो,
और सवर्ण वर्चस्व को सुरक्षित रखो।
आदिवासी समाज का धर्म, संस्कृति और पहचान जल-जंगल-ज़मीन से जुड़ी है,
लेकिन कमंडल राजनीति ने आदिवासियों को
उनके असली सवालों से काटकर
एक “भीड़” में बदलने की कोशिश की।
आज भी जब शिक्षा, नौकरी, ज़मीन और संसाधनों की बात आती है,
तो कमंडल चुप रहता है—
और जब वोट चाहिए,
तो वही धर्म सबसे आगे कर दिया जाता है।
आदिवासी–बहुजन मुक्ति का रास्ता मंडल से होकर जाता है,
कमंडल से नहीं।

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