खाली सीटें नहीं, खाली सिस्टमशिक्षा में बराबरी की शुरुआत कहाँ अटक जाती है?
जब भी आरक्षण की बात होती है,
सारी चर्चा प्रवेश परीक्षा और सीटों पर आकर रुक जाती है।
लेकिन असली सवाल इससे पहले का है—
👉 क्या सभी बच्चों को एक जैसी शुरुआत मिलती है?
अगर शुरुआत ही असमान हो,
तो परिणाम में बराबरी की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
1️⃣ स्कूल से ही छूट जाता है आदिवासी बच्चा
आदिवासी और सुदूर इलाकों में आज भी:
शिक्षक नियमित नहीं हैं
स्कूल भवन और प्रयोगशालाएँ अधूरी हैं
डिजिटल सुविधा नाम मात्र की है
जब बुनियाद ही कमज़ोर हो,
तो प्रतियोगिता बराबरी की कैसे होगी?
2️⃣ भाषा और संस्कृति भी बाधा बना दी जाती है
बच्चा अपनी मातृभाषा में तेज़ होता है,
लेकिन परीक्षा और पढ़ाई ऐसी भाषा में होती है
जो उसके जीवन से जुड़ी ही नहीं।
👉 यह कमजोरी नहीं,
👉 सिस्टम द्वारा थोपी गई बाधा है।
3️⃣ आरक्षण प्रवेश देता है, सम्मान नहीं
बहुत से छात्र संस्थान में पहुँच तो जाते हैं,
लेकिन वहाँ:
भेदभाव
उपेक्षा
मानसिक दबाव
उन्हें यह एहसास दिलाया जाता है
कि वे “योग्यता” से नहीं,
“कोटे” से आए हैं।
👉 शिक्षा का माहौल बराबरी का नहीं रहता।
4️⃣ ड्रॉपआउट और आत्महत्या—कड़वी सच्चाई
जब समर्थन नहीं मिलता,
तो ड्रॉपआउट बढ़ते हैं।
कभी-कभी यह दबाव
जान तक ले लेता है।
फिर कहा जाता है—
“सीट खाली रह गई।”
निष्कर्ष
सवाल सीटों का नहीं,
सिस्टम की संवेदनहीनता का है।
अगर शिक्षा सच में समान हो,
तो आरक्षण को लेकर
इतना शोर ही न मचे।
❓ सवाल
क्या सरकार और समाज
बराबरी की शुरुआत स्कूल से करने को तैयार हैं?
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