विकास का दावा और आदिवासी हक़ीक़त: सवाल पूछना कब से गुनाह हो गया?


भारत में विकास की बात होते ही बड़े-बड़े प्रोजेक्ट, चमकती सड़कें और ऊँची इमारतों की तस्वीर दिखाई जाती है।
लेकिन ज़मीन पर खड़े होकर अगर देखा जाए, तो यह विकास अक्सर आदिवासी समाज के जल, जंगल और ज़मीन से होकर गुजरता है।
आदिवासी समाज विकास का विरोधी नहीं है।
विरोध उस विकास का है जो सहमति के बिना हो,
जो विस्थापन को “राष्ट्रहित” कह दे,
और जो पीढ़ियों की जीवन-पद्धति को मिटाकर आगे बढ़े।
जब आदिवासी सवाल पूछते हैं—
हमारी ज़मीन क्यों ली जा रही है?
हमारी सहमति कहाँ है?
हमारे लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार क्यों नहीं?
तो जवाब में हमें विकास-विरोधी बता दिया जाता है।
लेकिन असली सवाल यह है कि
अगर विकास सबके लिए है,
तो उसका सबसे बड़ा क़ुर्बान आदिवासी ही क्यों बनता है?
संविधान हमें बोलने का अधिकार देता है,
अपने संसाधनों पर अधिकार देता है,
और सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है।
आदिवासी समाज चुप नहीं है,
वह अपने हक़ के साथ खड़ा है।
सवाल पूछना आंदोलन नहीं,
यह लोकतंत्र की बुनियाद है।

क्या ऐसा विकास, जिसमें आदिवासी की आवाज़ ही न सुनी जाए, सच में विकास कहलाने योग्य है?

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