विकास बनाम विस्थापन: आदिवासी इलाकों में विकास किसके लिए?
विकास का नाम सुनते ही
सड़क, फैक्ट्री, खदान और बड़े प्रोजेक्ट याद आते हैं।
लेकिन आदिवासी इलाकों में
यही विकास अक्सर विस्थापन और टूटते जीवन की कहानी बन जाता है।
आदिवासी समाज के लिए
जल, जंगल और ज़मीन
केवल संसाधन नहीं,
बल्कि संस्कृति, पहचान और अस्तित्व हैं।
जब विकास के नाम पर
ग्राम सभा की सहमति के बिना
ज़मीन छीनी जाती है,
तो यह विकास नहीं,
बल्कि अन्याय होता है।
संविधान और कानून
आदिवासी समाज को सुरक्षा देते हैं,
आपके क्षेत्र में जो “विकास परियोजनाएँ” आई हैं,
क्या उनसे स्थानीय लोगों का जीवन बेहतर हुआ है?
अपना अनुभव साझा करें।
लेकिन ज़मीनी स्तर पर
इनकी अनदेखी आम बात बन गई है।
सवाल यह नहीं है कि
विकास हो या नहीं,
सवाल यह है कि
विकास किसकी कीमत पर?
सच्चा विकास वही है
जो आदिवासी समाज को
साथ लेकर चले,
उसकी सहमति, सम्मान
और भविष्य की रक्षा करे।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें