आदिवासी समाज और संविधान: अधिकार कागज़ पर हैं, ज़मीन पर क्यों नहीं?
भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देने की बात करता है।
लेकिन जब बात आदिवासी समाज की आती है, तो यह सवाल उठता है कि
क्या ये अधिकार केवल काग़ज़ों तक सीमित रह गए हैं?
संविधान की पाँचवीं और छठी अनुसूची, PESA कानून, वन अधिकार कानून —
ये सभी आदिवासियों की जल, जंगल और ज़मीन की सुरक्षा के लिए बने।
फिर भी आज आदिवासी इलाकों में
ज़मीन अधिग्रहण, विस्थापन और प्रशासनिक हस्तक्षेप लगातार बढ़ता जा रहा है।
ग्राम सभा को सर्वोच्च बताया गया,
लेकिन व्यवहार में ग्राम सभा की सहमति को अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है।
निर्णय कहीं और लिए जाते हैं,
और आदिवासी समाज को केवल परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
यह सिर्फ क़ानून की समस्या नहीं है,
यह नियत और समझ की समस्या है।
जब तक प्रशासन और समाज
आदिवासी स्वशासन को सम्मान नहीं देगा,
तब तक संविधान की आत्मा अधूरी रहेगी।
आज ज़रूरत है कि
आदिवासी समाज अपने संवैधानिक अधिकारों को जाने, समझे और माँगे।
क्योंकि अधिकार वही सुरक्षित रहता है,
जिसके लिए समाज जागरूक और संगठित हो।
जागरूकता ही आंदोलन की पहली सीढ़ी है।
आपके क्षेत्र में ग्राम सभा के निर्णयों को कितना महत्व दिया जाता है?
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