आदिवासी अस्तित्व और स्वशासन

 🔴 आदिवासी अस्तित्व पर हमला और हमारा आंदोलन

भारत का आदिवासी समाज कोई नया समाज नहीं है। यह समाज इस धरती का मूल निवासी है, जिसने जंगल, जल, जमीन और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जिया है। आज उसी समाज के अस्तित्व पर सबसे बड़ा संकट खड़ा किया जा रहा है।

प्रशासनिक तंत्र और कॉर्पोरेट शक्तियाँ मिलकर आदिवासी क्षेत्रों को लूटने का कार्य कर रही हैं। ग्राम सभा, परंपरागत व्यवस्था और स्वशासन को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है। फर्जी जमीन रजिस्ट्रेशन, जबरन अधिग्रहण और झूठे मुकदमे इसके उदाहरण हैं।

जब कोई आदिवासी अपने हक़ की आवाज़ उठाता है, तो उसे अपराधी बना दिया जाता है। लेकिन जब बड़े पूंजीपति कानून तोड़ते हैं, तो प्रशासन चुप रहता है। यह दोहरा चरित्र अब स्वीकार्य नहीं है।

हमारा आंदोलन किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व, सम्मान और अधिकार के लिए है। यह लड़ाई संविधान की आत्मा, पाँचवी अनुसूची और ग्राम सभा की सर्वोच्चता की रक्षा की लड़ाई है।

आज जरूरत है कि आदिवासी समाज जागे, संगठित हो और अपनी पारंपरिक व्यवस्था को फिर से मजबूत करे। भगवान बिरसा मुंडा का संघर्ष हमें यही सिखाता है — “डरो मत, अन्याय के खिलाफ खड़े हो।”

✊ जल, जंगल, जमीन — हमारा अधिकार है।

— प्रकाश उरांव

(आदिवासी विचारक)

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